Thursday, October 29, 2015

सुख का सागर लहराता है

ऐसे तो हर कोई सुख की खोज में लगा है पर जो सचेतन होकर सुख की तलाश में निकलता है वह एक दिन स्वयं को सुख के सागर में पाता है. सुख की तलाश जब सजग होकर की जाती है तो उसका पता पूछना होगा, जो भी ऐसे कारण हैं जो सुख को दूर करते हैं उन्हें मिटाना होगा. सजगता ही वह सूत्र है जो किसी को भी मंजिल तक पहुंचा सकती है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि सुख को बनाना नहीं है वह तो मौजूद है, अनंत मात्रा में मौजूद है, जरूरत है उसका पता पूछकर उस दिशा में कदम बढ़ाने की.  

5 comments:


  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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    1. बहुत बहुत आभार !

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  2. सुख तो सदैव हमारे अन्दर है..आवश्यकता है उसे हमें तलाश करने की..

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  3. सजगता ही वह डोर है जिसे पकड - कर मनुष्य अपनी मञ्जिल तक पहुँच सकता है । शुभमस्तु ।

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  4. कैलाशजी व शकुंतला जी, स्वागत व आभार !

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