Friday, October 13, 2017

मन को अपना मीत बनाएं

१३ अक्तूबर २०१७ 
संतजन कहते हैं, हमारे सारे दुःख स्वयं के ही बनाये हुए हैं. हमारा मन विरोधी इच्छाओं का जन्मदाता है. मन स्वयं ही स्वयं के विपरीत मार्ग पर चलता है और स्वयं ही स्वयं को दोषी ठहराता है. कितना अच्छा हो कि बुद्धि में विवेक जागृत हो और मानव सदा अपने हित में ही निर्णय ले. वह श्रेय के मार्ग का पथिक हो. प्रेय के मार्ग पर चलकर स्वयं अपनी ही हानि करते हुए हम न जाने कितनी बार वही-वही भूलें करते हैं, जो हमें स्वधर्म से दूर ले जाती हैं. अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए हम मन को शुद्ध बना सकते हैं. निर्मल मन में ही आत्मा की झलक मिलती है. आत्मज्ञान होने के बाद ही व्यक्ति का वास्तविक जीवन आरम्भ होता है. 

Thursday, October 12, 2017

जब आवे संतोष धन

१२ अक्तूबर २०१७ 
साधक की नजर किस तरफ है सारा दारोमदार इसी पर है. क्या हम मात्र सुख के अभिलाषी हैं अथवा सुख के साथ-साथ संतुष्टि के भी. सुख क्षणिक है और उसकी कीमत चुकानी होगी. संतुष्टि समझ से आती है और दीर्घकालिक होती है. संतों और सदगुरुओं के वचनों से प्राप्त समझ जब जीवन में चरितार्थ होने लगती है तब जीवन नदी की शान्त धारा की तरह एक दिशा में प्रवाहित होने लगता है. जिसके तटों पर विश्राम भी किया जा सकता है और जिसके शीतल जल में सहजता से तैरा भी जा सकता है. जब सुख की तलाश में स्वयं को खपाकर और हाथ में दुःख के खोटे सिक्के पकड़ कर संसार सागर में लहरों के साथ ऊपर-नीचे डोलते रहने को ही जीवन समझ लिया जाता है, जीवन  संघर्ष बन जाता है. 

Tuesday, October 10, 2017

जग में रहे साक्षी बन जो

१० अक्तूबर २०१७ 
अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है. लाओत्से ने कहा है कि कोई मुझे हरा ही नहीं सका, कोई मेरा शत्रु भी न बना, कोई मुझे दुःख भी न दे सका क्योंकि मैंने न जीत की, न मित्रता की न सुख की अपेक्षा ही संसार से की. जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा है. परमात्मा ने किसी को इस जगत में खाली हाथ नहीं भेजा है. हम यदि उसके हैं और वह भरा हुआ है तो हमें किस बात की कमी हो सकती है. हम जिस शांति और ख़ुशी की तलाश बाहर कर रहे हैं, यदि उसी की तलाश भीतर करें तो वह मौजूद ही है. वास्तव में हमें वस्तुओं, व्यक्तियों और घटनाओं का साक्षी होना सीखना है, उनसे जुड़ना अथवा उनके द्वारा कुछ पाने की इच्छा करना ही दुःख को निमन्त्रण देना है.

Monday, October 9, 2017

अपने घर बैठा पर भूला

६ अक्तूबर २०१७  
कबीर कहते हैं, हरि का घर खाला का घर नहीं है, उनका अर्थ यह नहीं है कि उसके घर जाना कठिन है बल्कि यह कि वह तो अपना ही घर है, खाला के घर भी जाना हो तो कुछ देर लगेगी. पर यहाँ तो अपने ही घर में बैठे हैं, बस नेत्र बंद हैं. सपना देख रहे हैं कि संसार में हैं. जीवन एक संघर्ष है ऐसा मान लिया है तो संघर्ष की तैयारी में लगे हैं. संत कहते हैं सत्य के प्रति जागना ही उससे मिलन का एक मात्र उपाय है                                                                                                                                                                                                                              

Tuesday, October 3, 2017

बहता जाये मन नदिया सा

३ अक्तूबर २०१७  
जीवन प्रतिपल नया हो रहा है, जो नदी सागर से वाष्पीभूत होकर ऊपर उठती है वही पर्वत शिखर पर हिम के रूप में घनीभूत होकर नये कलेवर में प्रकटती है, वही फिर द्रवित होकर बहती है. जल के रूप में वह जगत का कितना कल्याण करती है. जीवात्मा अदृश्य है, वाष्प की भांति, वही देह धारण करती है और फिर फिर मन के रूप में जगत में प्रवाहित होती है. संवेदनशील मन के द्वारा ही जगत में कितने उपकार होते हैं, नये-नये आविष्कार, नित नये साहित्य का सृजन मन के द्वारा ही सम्भव है. ऐसा मन जो निरंतर प्रेम और विश्वास की सुगंध से भरा होता है आस-पास के वातावरण को भी सुवासित कर देता है.                                                                                                                                                                                                                              

Thursday, September 28, 2017

एक चेतना सबको जोड़े

२८ सितम्बर २०१७ 
जब हम कहते हैं ‘घट घट में राम’, तब हम सभी के मध्य अनुस्यूत एक समान धारा को देखने का  प्रयास कर रहे होते हैं. मानवों के स्वभाव पृथक-पृथक हैं, ज्ञान का स्तर भी एक नहीं है, रूप-रंग में एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों के समान नहीं होते, किंतु उन्हें एक करती है भीतर की चेतना, वही उन्हें निकट लाती है और वही उन्हें सशक्त करती है. व्यक्ति चेतना से जितना दूर निकल जाते हैं, समाज में विघटन उतना ज्यादा होता है. जहाँ वर्गभेद भारी हो, लोगों को आपस में जुड़ने के लिए कोई तो समानता चाहिए. समान रूचि वाले व्यक्ति जुड़ जाते हैं, क्योंकि उनकी चेतना किसी एक दिशा में प्रवाहित होती है. जितना-जितना व्यक्ति चेतना को मुखर होने का अवसर देगा, उसे भेद गिरते नजर आयेंगे. समाज में एकता बढ़ेगी और एकता में ही शक्ति है. शक्ति की पूजा के पर्व पर इसे याद रखना होगा. 

Tuesday, September 26, 2017

शक्ति जगे जब भीतर पावन

२७ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना अनमोल है इसका ज्ञान उसी को होता है जो या तो अपनी अंतिम श्वासें गिन रहा हो अथवा जिसने मीरा की तरह अपने भीतर उस अनमोल रतन को पा लिया हो. नवरात्रि के ये नौ दिन इसी का स्मरण कराने आते हैं. शक्ति की पूजा का अर्थ है स्वयं के भीतर सुप्त शक्तियों को जगाना, हर मानव के भीतर देव और दानव दोनों का वास है. हममें से अधिकतर तो दोनों से ही अपरिचित रह जाते हैं. कुछ क्रोधी और अहंकारी स्वभाव वाले दानवों की भाषा बोलने लगते हैं, उनके भीतर देवी का जागरण नहीं होता. साधना के द्वारा जब शक्ति जगती है तो ही इन दानवों का विनाश होता है और एक नई चेतना से हमारा परिचय होता है. जीवन का सही अर्थ तभी दृष्टिगत होता है और तब लगता है इतना अनमोल जीवन व्यर्थ ही जा रहा था. उत्सवों का निहितार्थ कितना उद्देश्यपूर्ण है. उन्हें मात्र दिखावे या मौज-मस्ती के लिए ही न मानकर, भक्ति और ज्ञान की गहराई में जाना होगा. यही  पूजा के मर्म को सही अर्थों में ग्रहण करना होगा.